‘प्यार में शाहीन बाग’ राठौर विचित्रमणि सिंह का पहला उपन्यास है जो देश के बदलते हालात को ऐतिहासिक, राजनैतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए प्रेम और घृणा, हिंसा और अहिंसा के मुद्दे को तथ्य और तर्क की कसौटी पर लेकर कसते हैं और अंत में स्वीकार करते हैं कि जानना और समझना मानवीय संबंधों को बहाल करने की कसौटी है। उपन्यास हिमांशु नामक युवक के बचपन से शुरु होता है जहां उसके अवलोकन और समझ की जगह उस पर झूठा सच थोपा जाता है। इससे नफरत की इकहरी दृष्टि लेकर वह शाहीन बाग के आंदोलन को ध्वस्त करने के इरादे से जाता है जहां विष भरे हृदय में प्यार अंकुर उगता महसूस करता है सोफिया से जो गांधी से प्रभावित है। उपन्यास का यह हिस्सा फसाद, गलत प्रचार, दुखद घटनाओं व हत्याओं से पाठक के मन पर गहरा असर डालता है और स्वयं हिमांशु के अंदर की इंसानियत उसकी हैवानियत पर भारी पड़ती है। वह इसी भावना के वेग में आकर असम आंदोलन में शिरकत करता है और कहता है कि जहां-जहां शाहीन बाग उभरेगा, वहां वहां मैं मौजूद रहूंगा। देशप्रेम, आपसी भाईचारा व सकारात्मक व नकारात्मक सोच को बिना किसी लंबी व्याया के लेखक ने समय के सूप से पछोड़ कर अलग व सराहनीय काम किया है। उपन्यास पढ़ा जाना चाहिए जिसके लिए लेखक बधाई का पात्र है।-नासिरा शर्मा
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